I am a poet staying in Mumbai.I like reading different kinds of book but spritual books are my favourite.
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सौ साल पहले मैं कर्जदार था


आपने कभी उधार लिया है. या ऐसे भी पूछा जा सकता है कि आपको कभी किसी ने उधार दिया है. उधारी के बडे किस्से हैं एक आदमी ने ट्रेन में किसी अंजान यात्री से उधार मांगा. अंजान आदमी बोला- आप मुझसे उधार कैसे मांग रहे है मैं तो आपको जानता नहीं, बन्दा बोला- इसी लिए तो आपसे मांग रहा हूँ.जो जानते हैं वो तो देते नहीं है. ऐसे ही एक स्कूल में शिक्षक ने गणित की क्लास में एक लडके से पूछा- मान लो मैने तुम्हारे पिताजी को 1200 रूपये पन्द्रह प्रतिशत ब्याज पर 6 महीने के लिए उधार दिया तो 6 महीने बाद तुम्हारे पिता जी कितना पैसा लौटायेंगे? लड़का बोला- तुम इतना सा गणित भी नहीं जानते. ळडका बोला – मैं गणित बहुत अच्छी तरह जानता हूँ . मगर आप मेरे बाप को नहीं जानते. किसी का लौटाया है जो आपका लौटायेंगे. तो उधार मांगना एक कला है. अगर आपको उधार मिल जाये तो आप सही कलाकार हैं. लेकर कभी न लौटायें तो आप सुपर हिट है. चलिए एक पैरोडी लिजिए. अगर आप बाथरूम टाइप के सिंगर है और इसे गाना चाहते हैं तो मुझे खुशी होगी. अगर रिकार्ड निकलवाना चाहे तो मुझे सूचित करें. पैरोडी मैंने इस तरह लिखी है.
सौ साल पहले मैं कर्जदार था, 2
आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
माँ बाप बीवी बच्चों के
सिर का मैं भार था 2
आज भी हू और कल भी रहूंगा. उधार जब कोई मिल जाये
मेरी तबीयत खिल जाती है जब वापस करना हो तो
मेरी नानी मर जाती है
देने वालो का हरदम करता इंतजार था 2
आज भी हू और कल भी करूंगा सौ साल पहले...........
एक वार जो देते फिर
ता उम्र वे रोते हैं
वे जागा करते रातों को
हम चैन से सोते है.
मैं तो पैदाएशी ऐसा होशियार था 2
आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
सौ साल पहले...........
इस घर में टी वी ,फ्रीज
और सोफा उधार से है हर हसीन जलवा
और मस्त बहार उधार से है उधार से ही लेने की
सौचता हर बार था 2 आज भी हूँ और कल भी रहूंगा
सौ साल पहले मैं कर्जदार था,
2007-07-31 09:55:03 GMTComments: 0 |Permanent Link
हमारी हकीकत
जहाँ की दौलत अपने पास न कोई जागीर रखते हैं
न कोई तलवार रखते हैं न कोई शमशीर रखते हैं
हँसाते हैं तो हँस लो तुम भी आज् जी भर के
वर्ना हम भी अपने सीने में दर्द की तस्वीर रखते हैं.
2007-07-09 06:50:45 GMTComments: 0 |Permanent Link
मैं भी तेरे जैसा हूँ



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2007-02-21 08:52:29 GMTComments: 1 |Permanent Link
आज ना छोड़ेंगे
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बाये से है. राकेश जोशी, देवमणि पांडेय ,यूनूस खान्, देवमणि पांडेय, महेश दूबे, महेन्द्र मोदी,बसंत आर्य,वीनू महेन्द्र और बैठी है कांचन प्रकाश और कुसुम जोशी.




आज ना छोड़ेंगे
मौका होली का था. होली के लिए विशेष प्रोग्राम की कल्पना की थी विविध भारती मुम्बई के केंन्द्र् निदेशक महेन्द्र मोदी जी ने और जोश था राकेश जोशी जी का. जब होली में सब यही कहते हैं कि आज ना छोड़ेंगे तो भला रेडियो वाले कवियों को कैसे छोड़ सकते थे. रिकार्डिंग के लिए बुलाया गया मुम्बई के ही छै कवियों को. कवि गण थे बहुत भारी इसीलिए सोच समझ कर दी गई थी कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी . और वो दी गई देवमणि पांडेय को. कवि गण थे- सर्दी खाँसी न मलेरिया हुआ से प्रसिद्धि पाने वाले वीनू महेन्द्र, बनारस के लोटे की तरह मुम्बई में मौजूद सभी कवियों में मोटे महेश दूबे साहब. जिन्हे उनके गोरेगाँव् फर्निचर से उठवाया गया था, जहाँ दिन भर बैठ कर वे भगवान का मन्दिर बेचा करते हैं. जब ग्राहक दुकान में नहीं होते उस वक्त वे कविताये लिखते रहते हैं अगर कविताय़ें भी नहीं लिखना हो पाता तो वे बाल ठाकरें जी के हिन्दी अख़बार “दोपहर का सामना” के पाठकों के सवालों से रू ब रू होते हैं और “डाईरेक्ट ऐक्शन” लेते है जो कि उनके कॉलम का नाम है. इस बात से उनकी प्रसिद्धि और बढी है कि वे अब बाल ठाकरे के बाद दूसरे शख्स हैं जो डाएरेक्ट ऐकशन लेते है.. उन्हें ज्यादा कमाई कविता से होती है या दुकान से ये मुम्बई के सारे हास्य कवियों की उत्सुकता का विषय है. अम्बरनाथ से दौड़े हुए आये थे दिनेश बाबरा जिसके बारे में मुम्बई के कवियों का ये मानना है कि पाँच फिट के उसके शरीर में हर अंग में दिमाग है और इंतना ज्यादा दिमाग होने के बावजूद वो बददिमाग़ नहीं है. विनम्र बहुत है और सबसे झुक कर मिलता है और मिलकर तनता नहीं है. इसीलिए लोग कहते हैं कि बहुत जल्द वो कॉलेज की नौकरी छोड़ेगा और मुम्बई में फ्लैट बुक करा कर आराम से कविताई करेगा. एक कवि मैं स्वयं था – बसंत आर्य. एक कवयित्री भी थी- कुसुम जोशी. ये कई जगहों पर अपनी टाँग फँसाये रखती हैं . सीरियल बनाती हैं. ऐड फिल्म बनाती हैं और हर रस की कवितायें करती हैं. गाती तो अच्छा है ही. वे इंतनी अच्छी दिखती हैं तो खुद अभिनय क्यों नहीं करती ये लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है. आज ही उन्हे उनके लड़के ने नया नया मोबाईल दिया था जिसे कैसे ओपरेट करना है ये प्रोग्राम के संचालक महोदय उन्हे सिखा रहे थे. नम्बर कैसे रिडायल किया जाता है ये सीखने के बाद कुसुम जी ने कहा- आज के लिए बस इतना काफी है तो यूनूस खान ने कहा आज न छोड़ेंगे. विविध भारती के दो कॉम्पेयर_ यूनूस खान जो “यूथ् एक्स्प्रेश” लेकर युवाओं में लोकप्रिय हैं और ‘सखी सहेली’ जिसे लेकर कांचन प्रकाश युवतियों में चरचा का विषय बनी रहती है- की उर्जा को देख कर सारे कवि दंग थे. कांचन जी का चुलबुलापन अपने चरम पर था. कार्यक्रम की रिकार्डिंग में सभी कवि मजा लेते रहे क्योंकि ये मंच से हट कर एक अलग अनुभव था. बीच में हास्य कवियों के पितामह काका हाथरसी की कुछ रिकार्डिंग सुन कर कवि धन्य हुए . वीरेन्द्र तरून जी के फाग छन्द सुन कर हम भी धन्य हुए. कार्यक्रम का प्रसारण होगा 4.3.2007 को दिन में 3 बजे से पाँच बजे के दौरान .
2007-02-21 07:42:15 GMTComments: 0 |Permanent Link
Nazm
ओम प्रकाश आर्य. ये वर्तमान में राजस्थान के अलवर जिले में एक गैर सरकारी संस्थान में कार्यरत है जिसे एन जी ओ कहा जाये तो ज्यादा लोग समझ पाते है और गैर सरकारी संस्थान कहा जाये तो पूछते हैं ये क्या होता है. ओम अति सम्वेदनशील है. अति कोई आतंकित करने के इरादे से नहीं कह रहा हूँ. अति का अर्थ बस इतना भर है कि जितनी सम्वेदनशीलता की जरूरत एक इंसान में होती है उतनी. क्योंकि आजकल सम्वेदनशीलता एक एपेंडिक्स की तरह है. बेकार की चीज. खैर ! कविताय़ें कहें या कहें कि साहित्य से हद दर्जे का अपनापा है. पिछले दिनों मुझे उसने मेल से एक नज्म भेजी तो मुझे लगा आप भी उस नज्म से रू ब रू हों .
दरअसल हम दोनों दुनिया के हिसाब से आपस में बहुत ज्यादा बातें नहीं करते पर हम दोनों ही एक दूसरे को बहुत समझते हैं. बुद्ध और महावीर के बारे में कहा जाता है कि वे एक बार मिले. पर दोनों की कुछ बात चीत नहीं हुई. बाद में शिष्यों ने पूछा कि कुछ बात क्यों नहीं की. दोनो महापुरूषों ने अपने अपने शिष्यों से कहा – जो मुझे पता है वो सब उन्हे पता है और जो उन्हे पता है वो सब मुझे पता है. है न गजब की बात. यहाँ एक शेर याद आता है-
नजर ने नजर से मुलाकात कर ली
रहे दोनों खामोश और बात कर ली
इसे बडी प्यारी आवाज के मालिक प्यारे गजल गायक भूपिन्दर और मिताली सिह ने खूबसूरत अन्दाज में गाया है.

कुछ ऐसा ही होता है अकसर
चलिए वह नज्म मुलाहिजा कीजिए-और पसन्द आये या आप कुछ कहना चाहें तो सीधे उसे भी मेल कर सकते हैं rural_om@rediffmail.com
नज्म
-ओम प्रकाश आर्य

पतझर में जो पत्ते
बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से,
वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं
उन सूखे पत्तों की रूहें
उसी आशियाने की दीवारों पे
सीलन की तरह बहती रहती है
किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नहीं
ये नम बनी रहती है
मौसम रिश्तों की रूहों को सुखा नहीं सकते.

- Om Prakash Arya

हाँ ये बताना रह ही गया कि ये मेरे छोटे भाई हैं.


2007-02-19 11:19:11 GMTComments: 0 |Permanent Link
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Basant Arya- In search of somethng
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